
णिरयतिरिक्खगदीसु य माणुसदेवत्तणे य संतेण ।
जं पत्तं इह दुक्ख तं अणुचिंतेहि तच्चित्तो॥1570॥
नरक और तिर्यंच गति में अथवा मनुज देव गति में ।
जो दुख भोगे तुमने उनका गहन विचार करो मन में॥1570॥
अन्वयार्थ : भो क्षपक! यहाँ तुम्हें क्या दु:ख है, जो शिथिल हुए हो? इस संसार में परिभ्रमण करते हुए तुमने नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति में जो दु:ख पाये हैं, उनका चित्त लगाकर चिंतवन करो! ऐसे कोई भी दु:ख बाकी नहीं रहे जो तुमने संसार में न भोगे हों । अनंतबार अग्नि में जल-जलकर मरे हो । अनंतबार जल में डूब-डूबकर मरे हो । अनंतबार पर्वतों से गिर-गिरकर मरे हो, अनंतबार कूप, तालाब, समुद्र में मरे हो । अनंतबार नदी में बहकर मरे हो । अनंतबार शस्त्रों से विदारे गये हो । अनंतबार घाणी में पेले गये हो, अनंतबार दुष्टों द्वारा खाये गये हो, पीसे गये हो, राँधे गये हो, झुलसे गये हो, अनंतबार क्षुधा की तीव्र वेदना से मरे हो । अनंतबार तृषा की वेदना से मरे हो, अनंतबार शीत वेदना से, अनंतबार उष्ण वेदना से, अनंतबार वर्षा की बाधा से, अनंतबार पवन की वेदना से मरे हो । अनंतबार विषभक्षण से मरे हो, अनंतबार तीव्र रोग की वेदना से मरे हो । अनंतबार भय से मरे हो । अनंतबार सिंह, व्याघ्र, सर्पादि दुष्ट जीवों द्वारा विदारे गये हो । अनंतबार चोरों द्वारा, भीलों द्वारा, राजाओं द्वारा, कोतवाल द्वारा, म्लेच्छों द्वारा मारे गये हो । अनंतबार अपनी स्त्री, पुत्र, बांधव, मित्र, कुटुम्बादि द्वारा तथा शत्रुओं द्वारा मारे गये हो । अब इस अवसर में मरण का भय करके रत्नत्रय को बिगाडना उचित नहीं है । अनेक दु:खों सहित अनंतकाल व्यतीत किये हैं । अब किंचित्मात्र वेदना होने पर परमधर्म में शिथिल होना उचित नहीं ।
सदासुखदासजी