
णिरएसु वेदणाओ अणोवमाओ असादबहुलाओ ।
कायणिमित्तिं पत्तो अणंतखुत्तो बहुविधावो॥1571॥
अनुपम दुख भोगे नरकों में तीव्र असाता कमाब से ।
काया की ममता से तुमने भोगे बार अनन्त अरे॥1571॥
अन्वयार्थ : भो मुने! तुमने इस संसार में शरीर के कारण असंयमी होकर ऐसे कर्म उपार्जन किये, जिससे नरकधरा को प्राप्त हुए, उन नरकों में अनेक प्रकार की उपमारहित असाता के आधिक्य सहित अनंतबार वेदना भोगी ।
सदासुखदासजी