जदि कोइ मेरुमत्तं लोहुण्डं पक्खविज्ज णिरयम्मि ।
उण्हे भूमिमपत्तो णिमिसेण विलेज्ज सो तत्थ॥1572॥
सुर या असुर मेरु-सम लोह पिण्ड को फेकें नरकों में ।
भू पर गिरने से पहले ही पिघल जाए नारक बिल में॥1572॥
अन्वयार्थ : उष्ण नरकों में ऐसी ऊष्मा/गर्मी है । यदि मेरु बराबर लोह का पिण्ड डाल दिया जाये तो वह वहाँ की उष्ण पृथिवी को प्राप्त होने के पहले रास्ते में ही विलीन हो जायेगा - पिघल जायेगा । ऐसी पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी पृथ्वी के बिलों में तथा पाँचवीं पृथ्वी के दो लाख बिल - सब मिलाकर ब्यासी लाख बिलों में घोर उष्ण वेदना असंख्यात कालपर्यंत कर्म के वश होकर भोगी । तो इस मनुष्य जन्म में ज्वरादि रोग जनित, तृषा जनित, ग्रीष्मकाल जनित किंचित् उष्णता की वेदना हो रही है तो धर्म के धारकों को समभावों से सहने योग्य नहीं है क्या? यह काल समभावों से परीषह सहने का है और यदि नहीं सहोगे तो कर्म बलवान हैं, छोडने वाले नहीं हैं । इसलिए परम धैर्य का अबलम्बन लो ।

  सदासुखदासजी