
तह चेव य तद्द हो पज्जलिदो सीयणिरयपक्खित्तो ।
सीदे भूमिमपत्तो णिमिसेण सडिज्ज लोहुण्डं॥1573॥
वैसे ही यदि लोह पिण्ड को फेकें शीत नरक बिल में ।
भू पर गिरने से पहले ही जमकर खण्ड-खण्ड होवे॥1573॥
अन्वयार्थ : उसी प्रकार दो लाख नरक के शीत वाले बिल हैं, उनमें भी लाख योजन प्रमाण लोह का पिंड डाल दिया जाये तो नरक की शीत-भूमि को प्राप्त होने के पहले ही एक निमिष/ टिमकार मात्र में ही खंड-खंड होकर बिखर जाता हैं । ऐसी शीतवेदना शीत नरक की पाँचवीं, छठवीं एवं सातवीं पृथ्वी के बिलों में जन्म धारण करके असंख्यात कालपर्यंत कर्म के वशीभूत होकर भोगी तो अब मनुष्य जन्म में शीतज्वरादिक-जनित तथा शीतकाल-जनित प्राप्त हुई जो शीतवेदना, वह धर्म के धारकों को सहने योग्य नहीं है क्या? इसलिए सचेत हो जाओ । किंचित्मात्र अल्प काल के लिये आई शीतवेदना में कायर होकर परम धर्म बिगाडकर संसार में परिभ्रमण मत करो ।
सदासुखदासजी