
होदि य णरये तिव्वा सभावदो चेव वेदणा देहे ।
चुण्णी कदस्स वा मुच्छिदस्स खारेण सित्तस्स॥1574॥
र्
जैसा दुःख होता है वैसा तन-स्वभाव से नरकों में॥1574॥
अन्वयार्थ : नरकों में स्वभाव से ही देह में तीव्र वेदना होती है तथा उनका देह नारकियों द्वारा चूर्ण किया गया, मूर्च्छा को प्राप्त हुआ और क्षार जल से सींचे गये नारकियों के शरीर में प्रचुर वेदना होती है ।
सदासुखदासजी