
जं कुडसामलीए दुक्खं पत्तोसि जं च सलम्मि ।
असिपत्तवणम्मि य जं जं च कयं णिद्धकंकेहिं॥1576॥
कंटकमय शालमलि वृक्षों पर अग्र भाग में सूली के ।
असिपत्रों से भरे विपिन में गृद्ध-काग की चोचों से॥1576॥
अन्वयार्थ : हे मुने! नरकों में कूटशाल्मली वृक्ष है, जिसमें ऊपर-नीचे काँटे होते हैं, उसमें घसीटने से प्राप्त हुए दु:खों से तुम दु:खी हुए हो । शूली के अग्रभाग में, असिपत्रों में तथा वज्रमय हैं चोंच जिनकी - ऐसे गृद्धपक्षी तथा काकपक्षी उनके द्वारा दु:ख को प्राप्त हुए हो ।
सदासुखदासजी