
सामसवलेहिं दोसं वइतरणीए य पाविओ जं सि ।
पत्तो कयंववालुयमइगम्ममसायमदितिव्वं॥1577॥
सामसवलिेहं दासिं वइतरणीए य िोवआि जं ेस ।
त्तिाि कयंववालुयमइगम्ममसायमेदेतव्वं॥1577॥
अन्वयार्थ : नरकों में श्यामशबल संज्ञक तथा अंबावरीष जाति के दुष्ट असुरकुमार देवों द्वारा परस्पर कराये गये घात, मरण उनके द्वारा दिये गये अति तीव्र दु:ख सहेे । उन्हें मन में स्मरण करो! तथा दु:सह, महा दुर्गंधमय, क्षार, रुधिर-राधमय महाभयानक वैतरणी नदी को प्राप्त हुए, उन घोर दु:खों का वर्णन कौन कर सकता है? सभी अंग फट जायें और जिसमें अग्नि-समान आतापकारी महा वेदना देनेवाला जल बहता है, ऐसी वैतरणी नदी में प्रवेश करके महादु:ख भोगे तथा कदंब-समान महादु:खकारी बालू को प्राप्त होकर तीव्र असाता को प्राप्त हुए हो ।
सदासुखदासजी