
जं णीलमंडवे तत्तलोहपडिमाउले तुमे पत्तं ।
जं पाइओसि खारं कडुयं तत्तं कलयलं च॥1578॥
तप्त लोह से बनी कामिनी से बलात् आलिंगन से ।
पिघला ताँबा पीने से जो दुःख भोगे वे सब सोचो॥1578॥
अन्वयार्थ : वहाँ लोहमय नीलमंडप में लोहमय गर्म पुतलियों के स्पर्शन से - बलात्कार से उत्पन्न हुए अति दु:खकारी आलिंगन, उससे प्राप्त हुए दु:खों का मन में चिंतवन करो! तथा नारकियों द्वारा पिलाये गये महाक्षार, कटुक, तप्तायमान रस से घोर दु:ख पाया है, उसे याद करो ।
सदासुखदासजी