
जं खाविओसि अवसो लोहंगारे य पज्जलंते तं ।
कंडुसु जं सि रद्घो जं सि कवल्लीए तलिओ सि॥1579॥
यन्त्रों से मुँह फाड़ खिलाये जलते लोहे के अंगार ।
भट्टी में था तुम्हें पकाया अरु कढ़ाई में तला गया॥1579॥
अन्वयार्थ : भो मुने! परवश हुए तुम्हें संडासिओं से मुख फाडकर-विदारकर प्रज्वलते/ जलते हुए लाल-लाल अंगारे भक्षण कराये गये थे, उनका स्मरण करो । तथा कढाइयों में राँधे गये, लोहमय यंत्रों में तले गये, उन्हें याद करो ।
सदासुखदासजी