कुट्टाकुट्टिं चुण्णाचुण्णिं मुग्गरमुसुण्ढित्थेहिं ।
जं वि सखंडो खंडिं कओ तुमं जणसमूहेण॥1580॥
हाथों में मुगदर लेकर तुमको कूटा था बारम्बार ।
जन समूह ने मूसल से था चूर्ण बनाया करो विचार॥1580॥
अन्वयार्थ : हे मुने! नरक में नारकियों द्वारा मुद्गर-मुसंडी आदि से छिन्न-छिन्न किये गये हो, हाथों द्वारा कूटे गये हो और चूर्ण-चूर्ण किये गये तथा नारकियों के द्वारा बारम्बार खंडख ंड किये गये हो, उनका चिंतवन करो ।

  सदासुखदासजी