
जं भज्जिदोसि भज्जिदंगपि व जं गलिओसि रसयं व ।
जं कप्पिओसि वल्लूरयं व चुण्णं व चुण्णकदो॥1583॥
भाजी जैसे भूने गए थे गुड़ के रसवत् छाना था ।
मांस-समान किये टुकड़े अरु चूर्ण तरह था चूर्ण किया॥1583॥
अन्वयार्थ : हे मुने! तुम भज्जिगद/साक के समान भंगनै/भरते या भूने गये हो - विदारे गये हो । रसवत् गाले गये हो/इक्षुरस को पकाकर जब गुड बनाते हैं, तब जैसे वह रस अतिशय रूप से पकता है, उसके समान तुम वहाँ पकाये गये हो अथवा गुड को गलाकर चासनी बनाते हैं, वैसे तुम गला-गला कर पकाये गये हो और वल्लूरवत् कतरे गये हो/शुष्क मांसवत् कतरे गये हो । उसका चिंतवन करो ।
सदासुखदासजी