पं-सदासुखदासजी
छेदणभेदणडहणं णिपीलणं गालणं छुहातण्हा ।
भक्खणमद्दणमलणं मिवकत्तणं सीदउण्हं च॥1592॥
छेदन भेदन दहन निपीड़न गालन और क्षुधा तृष्णा ।
भक्षण मर्दन शीत उष्ण के सब दुःख पड़े तुम्हें सहना॥1592॥
सदासुखदासजी