जं अत्ताणो णिप्पडियम्मो बहुवेदणुद्दिओ पडिओ ।
बहुएहिं भदो दिवसेहिं चडप्पडंतो अणाहो तं॥1593॥
कोई न रक्षक नहिं प्रतिकार महा पीड़ा से पतित हुए ।
बहुत दिनों में तड़प-तड़प कर होकर दीन-अनाथ मरे॥1593॥
अन्वयार्थ : तिर्यंचगति में अनेक प्रकार की ताडना, त्रास देना, बन्धन, वाहन, लंबन, विहंडन, दमन, कर्णछेदन, नासिकाछेदन, बीजविनाशन तथा छेदन, भेदन, दहन, निपीडन, गालन तथा क्षुधा, तृषा, भक्षण, मर्दन, मलन, विकीर्णन, शीत, उष्ण, इत्यादि दु:खों को अशरण होकर सहा । नहीं है इलाज जिसका, ऐसी बहुत वेदना से पीडित होकर पडता हुआ बहुत दिनों पर्यंत दु:ख भोग-भोगकर मरा, छटपटाहट करता हुआ अनाथ होकर बारम्बार मरण किया, उसका चिन्तवन करो ।

  सदासुखदासजी