सुविहिय अदीदकाले अणंतकायं तुमे अदिगदेण ।
जम्मणमरणमणंतं अणंतखुत्ता समणुभूदं॥1595॥
हे चारित्र सुशोभित! तुमने जन्म लिया है काय अनन्त ।
जन्म-मरण के महा कष्ट को भोगा तुमने बार अनन्त॥1595॥
अन्वयार्थ : हे सुन्दरचरित्र के धारक ! पूर्व में गया जो अतीत काल, उसमें निगोद-अनंतकाय में रहकर तुमने अनन्तबार जन्म-मरण की पीडा भोगी है, उसका चिन्तवन करो ।

  सदासुखदासजी