
इच्चवमादिदुक्खं अणंतखुत्ते तिरिक्खजोणीए ।
जं पत्तोसि अदीदे काले चित्तेहि तं सव्वं॥1596॥
इसप्रकार जो दुःख भोगे हैं तिर्यक् गति में बारम्बार ।
भूतकाल में अहो क्षपक तुमने अब इनका करो विचार॥1596॥
अन्वयार्थ : भो मुने! अतीत काल में तिर्यंचयोनि के दु:ख अनन्तबार प्राप्त हुए, उसका चिन्तवन करो । यहाँ तुम्हें क्या दु:ख हैं? इसप्रकार तिर्यंच गति के दु:खों का स्मरण कराया ।
सदासुखदासजी