
देवत्त माणुसत्तो जं ते जाएण सकयकम्मवसा ।
दुक्खाणि किलेसा वि य अणंतखुत्तो समणभूदं॥1597॥
कभी किन्हीं शुभ कर्माेदय से तुम्हें मिली नर-सुर पर्याय ।
किन्तु वहाँ भी तीव्र क्लेश अरु दुःख भोगे हैं बारम्बार॥1597॥
अन्वयार्थ : हे मुने! स्वयं किये कर्म के वश से देवपने तथा मनुष्यपने में उत्पन्न होकर भी तुमने अनन्त दु:खों का और क्लेशों का अनन्त बार अनुभव किया है, भोगा है ।
सदासुखदासजी