
परभिच्चदाए जंतेअसब्भवयणोहिं कडुगफरुसेहिंं ।
णिब्भत्थणावमाणणतज्जण दुक्खाइं पत्ताइं॥1599॥
बने दास जब अन्य जनों के तब असभ्य कटु वचन सहे ।
तिरस्कार अपमान डाँट धिक्कार आदि सब दुख भोगे॥1599॥
अन्वयार्थ : देव-मनुष्य पर्याय में अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय जनों के वियोग का दु:ख, उन्हें याद करते ही हृदय फट जाये, ऐसे प्रसंग भी बहुत बार प्राप्त हुए तथा जिनका नाम सुनते ही मस्तक में शूलवेदना समान वेदना हो, ऐसे महादुष्ट अप्रियों के साथ बसने से उत्पन्न हुए दु:ख भी बहुतबार भोगे । अपने वांछित का लाभ न होने से जो मानसिक दु:ख प्राप्त हुए, उनका चिन्तवन करो । पर के सेवकपने में पराधीन होकर, अयोग्य, कटुक , कठोर वचनों से तिरस्कार तथा अपमान-तर्जनादि के दु:खों को प्राप्त हुए हो, उनका चिन्तवन करो ।
सदासुखदासजी