
दीणत्तरो सचिंतासोगामरिसिग्गिपउलिदमणो जं ।
पत्तो घोरं दुक्खं माणुसजोणीए संतेण॥1600॥
नर गति में रहकर तुमने चिन्ता शोकादिक दुःख सहे ।
दैन्य भाव अरु काम क्रोध की अग्नि से संतप्त रहे॥1600॥
अन्वयार्थ : मनुष्यभव पाकर भी दीनपना, रोष, चिन्ता, शोक के वश होकर दु:ख भोगे तथा क्रोधरूप अग्नि से प्रज्वलित है मन जिसका, ऐसे जीव ने जो घोर दु:ख पाये हैं, उनका चिन्तवन - स्मरण करो ।
सदासुखदासजी