दंडणमुंडणताडणधरिसणपरिमोस संकिलेसा ।
धणहरणदारधरिसणघरदाह जलादिधणनासं॥1601॥
दंडन मुंडन ताड़न दूषण धन चोरी या होय विनाश ।
त्रिया हरण अरु चरित हनन या अग्नि जलादि का उत्पात॥1601॥
अन्वयार्थ : तीव्र राजादि से, दुष्ट कोटपालों से, राजा के दुष्ट मंत्री द्वारा, भील-म्लेच्छों द्वारा दिये गये कठोर दंड से, मुण्डन करा देने से, अनेक प्रकार की ताडना से, नरक के बिल समान बन्दीखानों में बंद कर देने से, चोरों द्वारा क्लेश को प्राप्त होने से, जबरदस्ती धन हरण कर लेने के दु:ख, स्त्री के हरण का दु:ख, अग्नि से घर जल जाने का दु:ख, घर-धनादि का जल में बह जाने से उत्पन्न हुआ दु:ख तथा धनरहित होने से उत्पन्न अनेक दु:ख, मनुष्य जन्म में बहुत बार प्राप्त हुए हैं, उनका स्मरण करके परम समता ग्रहण करना उचित है ।

  सदासुखदासजी