
देवो माणी संतो पासिय देवे महढ्ढिए अण्णे ।
जं दुक्खं सम्पत्तो घोरं भग्ग्ेण माणेण॥1608॥
अन्य सुरों की महा ऋद्धि को लखकर खण्डित होता मान ।
मानी होने से जो दुःख भोगे अब तुम उनका करो विचार॥1608॥
अन्वयार्थ : देव अभिमानी होने पर भी अन्य महर्द्धिक देवों को देखकर और मानभंग होने से घोर दु:ख को प्राप्त हुए, उसका चिन्तवन करो ।
सदासुखदासजी