
दिव्वे भोगे अच्छरसाओ अवसस्स सग्गवासं च ।
पजहंतगस्स जं ते दुक्खं जादं चयणकाले॥1609॥
परवश होकर दिव्य भोग सुर ललना तथा स्वर्ग आवास ।
तजना पड़ा आयु क्षय से तो जो दुःख भोगे करो विचार॥1609॥
अन्वयार्थ : स्वर्ग लोक में मरण के समय कर्माधीन होकर अनेक अप्सराओं के दिव्य भोगों को तथा स्वर्ग के निवास को छूटते हुए जानकर उन देवों को महान दु:ख उत्पन्न होता है, उसका चिन्तवन करो ।
सदासुखदासजी