
जं गब्भवासकुणिमं कुणिमाहारं छुहादिदुक्खं च ।
चिंतंतगस्स यं सुचि सुहिदयस्स दुक्खं चयणकाले॥1610॥
होगा गर्भवास दुर्गन्धित होगा दुर्गन्धित भोजन ।
क्षुधा-तृषा की बाधा होगी दुःख भोग कर यह चिन्तन॥1610॥
अन्वयार्थ : महापवित्र और सुखी देवों को मरणकाल में ऐसा विचार आता है कि अब मुझे यहाँ से च्युत होकर तिर्यंच-मनुष्यगति के महानिंद्य गर्भावास में रहना पडेगा, मनुष्य-तिर्यंच गति सम्बन्धी दुर्गंधमय मलिन आहार का, क्षुधा-तृषादि के दु:खों का चिन्तवन करते ही महान दु:ख उत्पन्न होता है ।
सदासुखदासजी