एवं एदं सव्वं दुक्खं चदुगदिगदं च जं पत्तो ।
तत्तो अणंत भागो होज्ज ण वा दुक्खभिमगं ते॥1611॥
इसप्रकार चारों गतियों में तुमने जो भी दुःख भोगे ।
उसका भाग अनन्त अरे इस नर भव में हो या न हो॥1611॥
अन्वयार्थ : हे मुने! इस प्रकार चतुर्गति में परिभ्रमण करते हुए इस जीव ने सभी प्रकार के दु:ख पाये हैं । उसके अनंतवें भाग भी दु:ख तुम्हें इस समय नहीं हैं तो तुम कैसे कायर होकर धर्म को मलिन करते हो?

  सदासुखदासजी