संखेज्जमसंखेज्जं कालं ताइं अविस्समन्तेण ।
दुक्खाइं सोढाइं किं पुण अदिअप्पकालमिमं॥1612॥
संखज्जिमसंखज्जिं कालं ताइं एवस्समन्तणि ।
दुक्खाइं साढिाइं किं िुण एदअप्किालेममं॥1612॥
अन्वयार्थ : हे मुने! ऐसे चतुर्गति के घोर दु:ख विश्राम रहित तुमने संख्यात-असंख्यात काल तक सहे तो इस संन्यास के समय अति अल्पकाल के लिये आया रोगादिजनित दु:ख क्या सहने योग्य नहीं हैं? हे क्षपक! अब धैर्य धारण कर,वेदना को सहकर आत्मकल्याण करो ।

  सदासुखदासजी