
जदि तारिसाओ तुह्मे सोढाओ वेदणाओ अवसेण ।
धम्मोत्ति इमा सवसेण कहं सोढुंण तीरेज्ज॥1613॥
जेद तापरसाआि तुह्मि साढिाआि वदिणाआि अवसणि ।
धम्मािेत्त इमा सवसणि कहं साढिुंण तीरज्जि॥1613॥
अन्वयार्थ : हे श्रमण! तुमने परवश होकर चतुर्गति में कैसी वेदना सही तो अब धर्मबुद्धि से अपनी स्वाधीनतापूर्वक यह अल्प दु:ख सहने में कैसे समर्थ नहीं हो?
सदासुखदासजी