तण्हा अणंत खुत्तो संसारे तारिसी तुमं आसी ।
जं पसमेदुं सव्वोदधीणमुदगं ण तीरेज्ज॥1614॥
तुमने एेसी तृषा वेदना भोगी बार अनन्त अरे ।
जिसे शान्त करने में सागर का जल भी असमर्थ कहें॥1614॥
अन्वयार्थ : भो साधो! संसार में भ्रमते हुए तुम्हें महातृषा की वेदना अनन्त बार हुई कि जिसे शान्त करने में सर्व समुद्रों का जल भी समर्थ नहीं है ।

  सदासुखदासजी