
आसी अणंतखुत्तो संसारे ते छुधावि तारिसिया ।
जं पसमेदंु सव्वो पुग्गलकाओ ण तीरेज्ज॥1615॥
तुमने एेसी क्षुधा वेदना भोगी बार अनन्त अहो ।
जिसे शान्त करने में सारे पुद्गल भी असमर्थ कहो॥1615॥
अन्वयार्थ : हे क्षपक! संसार में तुम्हें ऐसी क्षुधावेदना भी अनन्त बार हुई है कि जिसे उपशमन करने को सम्पूर्ण पुद्गल राशि भी समर्थ नहीं है ।
सदासुखदासजी