जदि तारिसया तण्हा छुधा य अवसेण ते तदा सोढा ।
धम्मोत्ति इमा सवसेण ण कधं सोढुं ण तीरेज्ज॥1616॥
यदि तुमने परवश होकर ये क्षुधा-तृषा के दुःख भोगे ।
तो अब इसको धर्म समझकर स्वेच्छा से क्यों नहिं सहते॥1616॥
अन्वयार्थ : जब पूर्व काल में अवश होकर तुमने दुस्सह घोर तृषा तथा क्षुधा की वेदना सहन की तो अब स्ववश होकर रत्नत्रय की बुद्धि से या धर्म जानते हुए तुम क्षुधा-तृषा की वेदना सहने में कैसे समर्थ नहीं हो?

  सदासुखदासजी