सुइपाणएण अणुसट्ठिभोयणेण य सदोवगहिएण ।
ज्झणोसहेण तिव्वा वि वेदणा तीरदे सहिदुं॥1617॥
धर्म कथा कानों से पीकर गुरु-शिक्षा भोजन करके ।
शुक्ल ध्यान औषधि लेकर तुम तीव्र वेदना सह सकते॥1617॥
अन्वयार्थ : तीन प्रकार की धर्मकथा के श्रवणरूपी पेय/पान करके, गुरुजनों का शिक्षारूप भोजन करके एवं शुभध्यानरूपी औषधि ग्रहण करके तुम तीव्र वेदना भी सहन करने में समर्थ हो जाओगे ।

  सदासुखदासजी