भीदो व अभीदो वा णिप्पडियम्मो व सपडियम्मो वा ।
मुच्चइ ण वेदणाए जीवो कम्मे उदिण्णम्मि॥1618॥
कर्म असाता की उदीरणा होने पर भय हो ना हो ।
करो न करो तुम उसका प्रतिकार किन्तु वह नहीं टले॥1618॥
अन्वयार्थ : हे मुने! कर्म का तीव्र उदय होने पर भय सहित हो या भय रहित हो, इलाज रहित हो या इलाज सहित हो, वेदना से नहीं बच पाओगे ।

  सदासुखदासजी