किह पुण अण्णो काहिदि उदिण्णकम्मस्स णिव्वुदिं पुरिसो ।
हत्थीहिं अतीरं तं भंतुं भंजिहिदि किह ससओ॥1625॥
तो साधारण पुरुष करंे क्या उदय असाता होने पर ।
जिसको तोड़ सके नहिं हाथी कैसे तोड़ सके निर्बल॥1625॥
अन्वयार्थ : जीव के अनुक्रम से पापकर्म का उदय आने पर सुखी करने की इच्छा करने वाले इन्द्रों सहित चतुरनिकाय के देव भी सुखी करने में समर्थ नहीं हैं तो अन्य कोई व्यक्ति, असाता वेदनीय कर्म की उदीरणा होने पर सुखी कैसे करेगा? जिसे नष्ट करने/तोडने में महाबलवान हाथी भी समर्थ नहीं उसे वशरहित बलहीन खरगोश कैसे तोड सकेगा?

  सदासुखदासजी