
किह पुण अण्णो मुच्चहिदि सगेण उदयागदेण कम्मेण ।
तेलोक्केण वि कम्मं अवारणिज्जं खु समुवेदं॥1628॥
उदय प्राप्त कमाब से बचने में जब सुर भी नहीं समर्थ ।
तो त्रिलोक के साधारण जन उसे टालने में असमर्थ॥1628॥
अन्वयार्थ : उदय को प्राप्त हुआ कर्म त्रैलोक्य के द्वारा भी रोका नहीं जाता तो स्वयं के द्वारा उत्पन्न किया गया और उदयकाल को प्राप्त हुआ कर्म आपको कैसे छोडेगा?
सदासुखदासजी