
कह ठाइ सुक्कपत्तं वाएण पडंतयम्मि मेरुम्मि ।
देवे वि य विहडयदो कम्मस्स तुमम्मि का सण्णा॥1629॥
सुर गिरि भी काँपे जिसमें उसमें पत्ते क्या ठहर सकें ।
देवों की भी दुर्गति जिससे दुर्बल नर क्या कर सकते॥1629॥
अन्वयार्थ : जिस वायु से मेरु का भी पतन हो जाये, उस वायु में क्या सूखे पत्ते ठहर सकते हैं? देवों को भी विघ्न करने वाला कर्म तुम्हें दु:खी करे, इसमें क्या संशय है?
सदासुखदासजी