
कम्माइं बलियाइं बलिओ कम्मादु णत्थि कोई जगे ।
सव्ववलाइं कम्मं मलेवि हत्थीव णलिणिवणं॥1630॥
कर्म बड़े बलवान जगत में इनसे अधिक न कोई बली ।
हाथी ज्यों कुचले कमलों को कर्म करें सब बल को क्षीण॥1630॥
अन्वयार्थ : जगत में कोई भी नहीं है । जिसमें विद्या का, बंधुजन का, शरीर का, धन का, परिवार का सबका बल है, उन्हें भी कर्म एक क्षणमात्र में मसल देता है । जैसे कमलों के वन को मदोन्मत्त हाथी मसल देता है, निगल जाता है ।
सदासुखदासजी