पं-सदासुखदासजी
पडिकुविदे वि सण्णे रडिदे दुक्खादिदे कि लिठ्ठे वा ।
ण य वेदणोवसामदि णेव विसेसो हवदि तिस्से॥1632॥
रोेने चिल्लाने से अथवा दुःख विषाद संक्लेश करो ।
किन्तु वेदना शान्त न होती अरु विशेषता कोई न हो॥1632॥
सदासुखदासजी