
अण्णो वि को वि ण गुणोत्थ संकिलेसेण होइ खवयस्स ।
अट्टं सुसंकिलेसो ज्झाणं तिरियाउगणिमित्तं॥1633॥
संक्लेश करने से कोई लाभ क्षपक को कभी न हो ।
आर्तध्यान संक्लेश भाव से तिर्यक् गति का बन्धक हो॥1633॥
अन्वयार्थ : हे मुने! विलाप करने से, विषाद करने से, रोने से, दु:ख से पीडित होने से, तथा क्लेश करने पर भी वेदना उपशान्त नहीं होगी, घटेगी नहीं, वेदना में अन्तर नहीं पडेगा । वेदना में संक्लेश करने पर भी कुछ भी गुण प्राप्त नहीं होते हैं । अधिक संक्लेश से एक तिर्यंचगति का कारण आर्त्तध्यान होगा ।
सदासुखदासजी