हदमागासं मुट्ठीहिं होइ तह कंडिया तुसा होंति ।
सिगदाओ पीलिदाओ घुसिलिदमुदयं च होइ जहा॥1634॥
जैसे नभ में मुष्टि1 मारना धान्य हेतु छिलके कूटें ।
तेल हेतु रेती पेलें अरु घी के लिए नीर मथें॥1634॥
अन्वयार्थ : जैसे मुष्टियों के प्रहार से आकाश को ताडना/मारना निरर्थक है, जैसे तंदुलों के लिए भूसे को कूटना निरर्थक है । जैसे तेल के लिए रेत का पेलना निरर्थक है, जैसे घृत के लिये जल का बिलोना - मथना निरर्थक है, केवल महाखेद का कारण है; तैसे ही असाता वेदनीयादि अशुभकर्म का उदय आने पर विलाप करना, रोना, संक्लेश करना, दीनता दिखाना निरर्थक है । वे दु:ख मेटने को समर्थ नहीं हैं, मात्र वर्तमान काल में दु:ख ही बढाते हैं और आगामी तिर्यंचगति तथा नरक-निगोद के कारणभूत ऐसे तीव्र कर्म को बाँधते हैं, जो अनंत काल में भी नहीं छूटेंगे ।

  सदासुखदासजी