पुव्वं सयमुवभुत्तं कालं णाएण तेत्तियं दव्वं ।
को धारणीओ धणिदस्स देंतओ दुक्खिओ होज्ज॥1635॥
ऋण लेकर उपयोग किया अरु कर्ज चुकाने का हो काल ।
वापस करते समय राशि को दुखी नहीं हो कर्जदार॥1635॥

  सदासुखदासजी