तह चेव सयं पुव्वं कदस्स कमस्स पाककलम्मि ।
णायागयम्मि को णाम दुक्खिओ होज्ज जाणंता॥1636॥
इसी तरह पहले बाँधे जो अशुभ, उदय में क्यों दुःख हो?
पूर्वबद्ध कमाब के फल में ज्ञानी कभी दुःखी न हों॥1636॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई पुरुष किसी से धन कर्ज लेकर भोगता है और उचित काल व्यतीत होने पर उस धन को साहूकार को देते समय ऋणवान पुरुष क्या न्याय से दु:खित होगा? न्यायमार्गी तो पर का धन जो कर्ज लिया था, वह करार पूर्ण होने पर देने में दु:खी नहीं होता । तैसे ही पूर्व में स्वयं उपार्जित किया कर्म अब न्यायमार्ग से/स्थिति पूर्ण होने पर उदय में आकर रस/फल देता है, उसे भोगने में कौन ज्ञानी दु:खी होगा? ज्ञानी तो कर्म का ऋण चुक जाने का बडा आनन्द मानते हैं ।

  सदासुखदासजी