इय पुव्वकदं इण मज्ज महं कम्माणुगत्ति णाऊण ।
रिणमुक्खणं च दुक्खं पेच्छसु मा दुक्खिओ होज्ज॥1637॥
यह दुख मेरे पूर्व किये कमाब का फल है यह जानो ।
दुःख को देखो ऋण मुक्ति-सम, अतः दुखी तुम मत होओ॥1637॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार अभी हमारा पूर्वकृत कर्म उदय में आया है, ऐसा जानकर दु:ख को, कर्ज उतर गये के समान देखना, दु:खी नहीं होना ।

  सदासुखदासजी