पुव्वकदमज्झ कम्मं फलिदं दोसेण इत्थ अण्णस्स ।
इदि अप्पणो पओगं णच्चा मा दुक्खिदो होज्ज॥1638॥
मेरे पूर्व किये कमाब के फल में नहीं किसी का दोष ।
अतः जानकर निज प्रयोग यह कर्माेदय में दुखी न हो॥1638॥
अन्वयार्थ : हे यते! उपसर्ग तथा दु:ख वेदना आने पर ऐसा चिन्तवन करो कि मेरे किये पूर्वकृत कर्म का फल मिला है, इसमें अन्य किसी का दोष नहीं है । इस प्रकार अपने किये कर्म को जानकर दु:खी मत होओ ।

  सदासुखदासजी