पं-सदासुखदासजी
सव्वेसिं सामण्णं अवस्सदायव्वयं करं काले ।
णाएण य को दाऊण णरो दुक्खादि बिलवदि वा॥1640॥
कर्म नाश का समय आए तो सभी भव्य श्रामण्य लहें ।
न्याय पूर्वक यह कर1 देकर कौन मनुष्य दुःखी होवे॥1640॥
सदासुखदासजी