सव्वेसिं सामण्णं करभूदमवस्सभाविकम्मफलं ।
इण मज्ज मेत्ति णच्चा लभसु सदिं तं धिदिं कुणसु॥1641॥
भाविकर्म फलदायक निश्चित अतः मुक्ति अभिलाषी को ।
कर समान श्रामण्य जान निज को ध्याओ अरु धैर्य धरो॥1641॥
अन्वयार्थ : जो सर्व जीवों को समय आने पर सामान्य कर/टैक्स देने योग्य होता है । वह न्यायमार्ग से देने में आया टैक्स, जो हासिल/प्राप्त किया अथवा दण्ड उसे देने में कौन मनुष्य दु:खी होकर विलाप करेगा? न्यायमार्गी तो खेद नहीं करते । तैसे ही समस्त जीवों के सामान्य टैक्स रूप कर्म का फल है । वह आज हमारे उदय में आया है, ऐसा जानकर अपने स्वरूप का स्मरण करके धैर्य धारण करो ।

  सदासुखदासजी