
अरहंतसिद्धकेवलि अधित्ता सव्वसंघसक्खिस्स ।
पच्चक्खाणस्स कदस्स भंजणादो वरं मरणं॥1642॥
अर्हन्तों सिद्धों को तथा निवासी देवों अरु संघ की ।
साक्षी में जो त्याग किया उसको तजने से मृत्यु भली॥1642॥
अन्वयार्थ : अरहन्त, सिद्ध और केवलियों की तथा उस क्षेत्र में रहने वाले देवताओं की एवं समस्त संघ की साक्षीपूर्वक किये गये त्याग को भंग/छोडने की अपेक्षा तो मरण श्रेष्ठ है । मरण तो निश्चित होगा ही, परन्तु व्रतभंग करना इस लोक में महानिंदनीय है तथा मार्ग बिगाडना है, धर्म का अपवाद कराना है और परभव में बहुत काल पर्यंत अनन्त दु:खों सहित अनन्त जन्म-मरण करना है ।
सदासुखदासजी