आसादिदा तओ होंति तेण ते अप्पमाणकरणेण ।
राया विव सक्खिकदो विसंवदंतेण कज्जम्मि॥1643॥
नृप साक्षी में किये कार्य में विसंवाद से नृप-अपमान ।
जिन-साक्षी में किया त्याग जो छोड़े तो जिन का अपमान॥1643॥
अन्वयार्थ : जैसे राजा की साक्षीपूर्वक किया गया जो कार्य, उसमें कोई विसंवाद करता है, अन्य प्रकार से करता है तो उस पुरुष ने राजा की अवज्ञा की, अपमान किया; तैसे ही अरहन्तादि पंचपरमेष्ठी की साक्षी से ग्रहण किये गये व्रतादिक को जो भंग करता है, उस पुरुष ने अरहन्तादि की विराधना की, अवज्ञा की, उनको कुछ गिना ही नहीं । उनसे पराङ्मुख हो गया ।

  सदासुखदासजी