जइ दे कदा पमाणं अरहंतादी हवेज्ज खवएण ।
तस्सक्खिदं कयं सो पच्चक्खाणं ण भंजिज्ज॥1644॥
अहो क्षपक! यदि तुम अर्हन्तों को प्रणाम स्वीकार करो ।
तो उनकी साक्षी में त्याग किया जो उसे न भंग करो॥1644॥
अन्वयार्थ : भो मुने! जो तुमने अरहन्तादि पंचपरमेष्ठी को प्रमाणभूत माना है तो उनकी साक्षी से ग्रहण किया जो त्यागव्रत संल्लेखना, उसे भंग मत करो ।

  सदासुखदासजी