सक्खिकदरायहीलणमावहइ णरस्स जह महादोसं ।
तह जिणवरादिआसादणा वि दोसं महं कुणदि॥1645॥
नृपसाक्षी की करें अवज्ञा महादोष का हो भागी ।
अर्हन्तादिक की असादना महादोष करनेवाली॥1645॥
अन्वयार्थ : जैसे राजा की साक्षीपूर्वक किये गये कार्य का लोप करना, वह तो राजा का तिरस्कार है, उस पुरुष को महादोष लगता है, तैसे ही जिनवरादि की विराधना भी इसलोकप रलोक में जीव को महादोष कारक है ।

  सदासुखदासजी