
तित्थयर पवयण सुदे आइरिए गणहरे महढ्ढीए ।
एदे आसादंतो पावइ पारंचियं ठाणं॥1646॥
तीर्थंकर, रत्नत्रय, आगम, सूरि, महा-ऋद्धिधारीक
ी असादना जो करता इस पारंचिक1 प्रायश्चित भागी॥1646॥
अन्वयार्थ : तीर्थंकरों की, रत्नत्रय की, श्रुतज्ञान की, आचार्य की, गणधरों की, महाऋद्धि धारकों की विराधना करने वाला पुरुष पारंचिक नाम के बडे भारी प्रायश्चित्त को प्राप्त होता है । पंच परमेष्ठियों की अवज्ञा करने वाले पुरुष को बडा भारी प्रायश्चित्त लेना पडता है ।
सदासुखदासजी