सक्खीकयरायासादणे हु दोसं करे हु एयभवे ।
भवकोडीसु य दोसं जिणादि आसादणं कुणइ॥1647॥
नृपति अवज्ञा जो करता वह इस भव में दोषी होता ।
अर्हन्तादिक की असादना से भव-भव दोषी होता॥1647॥
अन्वयार्थ : राजा की साक्षीपूर्वक ली हुई प्रतिज्ञा का लोप करना, वह तो राजा का तिरस्कार है । वह तो एक भव में ही दोष करता है, किन्तु जो जिनेन्द्र देव की साक्षीपूर्वक नियम लेकर भंग करता है, उसने जिनेन्द्रदेव की विराधना की । वह कोटि-कोटि भवों में दोष-दु:ख को प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी