मोक्खभिलासिणो संजदस्स णिधणगमणं पि होइ वरं ।
पच्चक्खाणं भंजंतस्स ण वरमरहदादिसक्खिकदा॥1648॥
शिवसुख कामी संयमधारी का मरना भी श्रेष्ठ कहा ।
जिन साक्षी में किये त्याग को तजना अहो अश्रेष्ठ कहा॥1648॥
अन्वयार्थ : मोक्ष के अभिलाषी संयमी को मरण की शरण लेना श्रेष्ठ है, परन्तु अरहन्तादि की साक्षीपूर्वक लिये गये प्रत्याख्यान त्याग को भंग करना श्रेष्ठ नहीं है ।

  सदासुखदासजी